असरन सरन बिरदु संभारी

चौपाई २, दोहा १८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥ मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥ २ ॥

अर्थ

अशरण-शरण विरद याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो तुम प्रभु, गुरु, पितु, माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “वानरों की और निषाद की विदाई” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा वानरों और निषाद की प्रेमपूर्ण विदाई एवं आलिंगन का वर्णन है।

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वानरों की और निषाद की विदाई