विभीषण का भगवान श्रीरामजी की शरण के लिए प्रस्थान और शरणप्राप्ति

विभीषण लंका त्यागकर भगवान श्रीरामजी की शरण में आते हैं। प्रभु उन्हें सहज करुणा से स्वीकार करते हैं और शरणागत वत्सलता का महान आदर्श प्रकट करते हैं।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १६ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥ साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी)। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! साधु का अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याण की हानि (नाश) कर देता है।

चौपाई

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥ चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य) से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मन में अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजी के पास चले।

चौपाई

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥ जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥ ३ ॥

अर्थ:

[वे सोचते जाते थे--] मैं जाकर भगवान् के कोमल और लाल वर्ण के सुन्दर चरणकमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देनेवाले हैं, जिन चरणों का स्पर्श पाकर ऋषिनारी तर गयीं और जो दण्डकवन को पवित्र करनेवाले हैं।

चौपाई

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥ हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥ ४ ॥

अर्थ:

जिन चरणों को जानकीजी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपट मृग के साथ पृथ्वी पर [उसे पकड़ने को] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजी के हृदय रूपी सरोवर में विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हीं को आज मैं देखूँगा।

दोहा

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४२ ॥

अर्थ:

जिन चरणों की पादुकाओं में भरतजी ने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणों को अभी जाकर इन नेत्रों से देखूँगा।

दोहा 43 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥ कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्र के इस पार (जिधर श्रीरामचन्द्रजी की सेना थी) आ गये। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रु का कोई खास दूत है।

चौपाई

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥ २ ॥

अर्थ:

उन्हें [पहरे पर] ठहराकर वे सुग्रीव के पास आये और उनको सब समाचार कह सुनाये। सुग्रीव ने [श्रीरामजी के पास जाकर] कहा- हे रघुनाथजी! सुनिये, रावण का भाई [आपसे] मिलने आया है।

चौपाई

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥ जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामजी ने कहा—हे मित्र! तुम क्या समझते हो (तुम्हारी क्या राय है)? वानरराज सुग्रीव ने कहा- हे महाराज! सुनिये, राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलनेवाला (छली) न जाने किस कारण आया है।

चौपाई

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥ सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥ ४ ॥

अर्थ:

[जान पड़ता है] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय। [श्रीरामजी ने कहा—] हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी। परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना!

चौपाई

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥ ५ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर हनुमानजी हर्षित हुए [और मन-ही-मन कहने लगे कि] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल हैं [शरण में आये हुए पर पिता की भाँति प्रेम करनेवाले हैं]।

दोहा

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४३ ॥

अर्थ:

[श्रीरामजी फिर बोले—] जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर (शूद्र) हैं, पापमय हैं; उन्हें देखने में भी हानि है (पाप लगता है)।

दोहा 44 के अंतर्गत
चौपाई

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ १ ॥

अर्थ:

जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

चौपाई

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥ जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥ २ ॥

अर्थ:

पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता। यदि वह निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?

चौपाई

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥ ३ ॥

अर्थ:

जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट, छल और छिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे कपीस! तुम्हें कुछ भी भय या हानि नहीं है।

चौपाई

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥ जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

क्योंकि हे सखे! जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरे शरण आई है तो मैं उसे प्राणों की तरह रखूँगा।

दोहा

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ ४४ ॥

अर्थ:

कृपा के धाम श्रीरामजी ने हँसकर कहा—दोनों ही स्थितियों में उसे ले आओ। तब अंगद और हनुमान सहित सुग्रीवजी 'कृपालु श्रीराम की जय हो' कहते हुए चले।

दोहा 45 के अंतर्गत
चौपाई

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥ दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥ १ ॥

अर्थ:

विभीषणजी को आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणाकर श्रीरघुनाथजी थे। नेत्रों को आनन्द का दान देनेवाले दोनों भाइयों को उन्होंने दूर ही से देखा।

चौपाई

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥ भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥ २ ॥

अर्थ:

फिर शोभा के धाम श्रीरामजी को देखकर वे पलक [मारना] रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये। भगवान् की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत के भय का नाश करनेवाला साँवला शरीर है।

चौपाई

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥ नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥ ३ ॥

अर्थ:

सिंह के-से कंधे हैं, विशाल वक्षःस्थल (चौड़ी छाती) अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवों के मन को मोहित करनेवाला मुख है। भगवान् के स्वरूप को देखकर विभीषणजी के नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। फिर मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे।

चौपाई

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥ सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूँ। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षसकुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है।

दोहा

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ ४५ ॥

अर्थ:

मैं कानों से आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव (जन्म-मरण) के भय का नाश करनेवाले हैं। हे दुखियों के दुःख दूर करनेवाले और शरणागत को सुख देनेवाले श्रीरघुवीर! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

दोहा 46 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु ने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त हर्षित होकर तुरंत उठे। विभीषणजी के दीन वचन सुनने पर प्रभु के मन को बहुत ही भाये। उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उनको हृदय से लगा लिया।

चौपाई

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥ कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥ २ ॥

अर्थ:

छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तों के भय को हरनेवाले वचन बोले—हे लंकेश! परिवार सहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है।

चौपाई

खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥ मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥ ३ ॥

अर्थ:

दिन-रात दुष्टों की मण्डली में बसते हो। [ऐसी दशा में] हे सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती।

चौपाई

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥ अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! नरक में रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्ट का संग [कभी] न दे। [विभीषणजी ने कहा—] हे रघुनाथजी! अब आपके चरणों का दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है।

दोहा

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ४६ ॥

अर्थ:

तब तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को विश्राम है, जब तक वह शोक के घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्रीरामजी को नहीं भजता।

दोहा 47 के अंतर्गत
चौपाई

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥ जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥ १ ॥

अर्थ:

लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किए हुए श्रीरघुनाथजी हृदय में नहीं बसते।

चौपाई

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देने वाली है। वह (ममतारूपी रात्रि) तभी तक जीव के मन में बसती है, जब तक प्रभु (आप) का प्रतापरूपी सूर्य नहीं उदय होता।

चौपाई

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥ तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥ ३ ॥

अर्थ:

हे श्रीरामजी ! आपके चरणारविन्द के दर्शन कर अब मैं कुशल से हूँ, मेरे भारी भय मिट गये। हे कृपालु! आप जिस पर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के भवशूल (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) नहीं व्यापते।

चौपाई

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥ जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं अत्यन्त नीच स्वभाव का राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के भी ध्यान में नहीं आता, उन प्रभु ने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।

दोहा

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥ ४७ ॥

अर्थ:

हे कृपा और सुख के पुंज श्रीरामजी ! मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है कि मैंने ब्रह्मा और शिवजी के द्वारा सेवित युगल चरणकमलों को अपने नेत्रों से देखा।

दोहा 48 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥ १ ॥

अर्थ:

[श्रीरामजी ने कहा--] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और गिरिजाजी भी जानते हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड़-चेतन जगत् का द्रोही हो, यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाय,

चौपाई

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥ जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥ २ ॥

अर्थ:

और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार--

चौपाई

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

इन सबके ममत्वरूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धों का केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है।

चौपाई

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥ तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसा करता है। तुम- सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं। मैं और किसी के निहोरे से देह धारण नहीं करता।

दोहा

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ ४८ ॥

अर्थ:

जो सगुण (साकार) भगवान् के उपासक हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान हैं।

दोहा 49 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥ राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥ १ ॥

अर्थ:

हे लंकेस! सुनो, तुम्हारे अंदर सभी गुण हैं। इससे तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो। श्रीरामजी के वचन सुनकर सब वानरों के समूह कहने लगे—कृपा-समूह की जय हो!

चौपाई

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥ पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु की वाणी सुनते ही, उसे कानों के लिए अमृत जानकर विभीषणजी तृप्त नहीं होते। वे बार-बार श्रीरामजी के चरणकमलों को पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, वह हृदय में समाता नहीं है।

चौपाई

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥ उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ ३ ॥

अर्थ:

[विभीषणजी ने कहा--] हे देव! हे चराचर जगत् के स्वामी ! हे शरणागत के रक्षक! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले! सुनिये, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीतिरूपी नदी में बह गयी।

चौपाई

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

अब तो हे कृपालु ! शिवजी के मन को सदैव प्रिय लगने वाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। एवमस्तु कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजी ने तुरंत ही समुद्र का जल माँगा।

चौपाई

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ ५ ॥

अर्थ:

यद्यपि, हे सखा, तुम्हारी इच्छा नहीं है, तथापि जगत् में मेरा दर्शन अमोघ है। ऐसा कहकर श्रीरामजी ने उनको तिलक कर दिया। आकाश से पुष्पों की अपार वृष्टि हुई।

दोहा

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ ४९ (क) ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने रावण के क्रोधरूपी अग्नि में, जो अपनी (विभीषण की) श्वासरूपी पवन से प्रचण्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषण को बचा लिया और उसे अखण्ड राज्य दिया।

दोहा

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥ ४९ (ख) ॥

अर्थ:

शिवजी ने जो सम्पत्ति रावण को दसों सिरों की बलि देने पर दी थी, वही सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी ने विभीषण को बहुत सकुचते हुए दी।