तब लगि हृदयँ बसत खल नाना
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना
चौपाई १, दोहा ४७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥ जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥ १ ॥
अर्थ
लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किए हुए श्रीरघुनाथजी हृदय में नहीं बसते।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।
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विभीषण की राम शरण