सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ
चौपाई १, दोहा ४८ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥ १ ॥
अर्थ
[श्रीरामजी ने कहा--] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और गिरिजाजी भी जानते हैं। कोई मनुष्य [सम्पूर्ण] जड़-चेतन जगत् का द्रोही हो, यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाय,
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।
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विभीषण की राम शरण