जे पद जनकसुताँ उर लाए
जे पद जनकसुताँ उर लाए
चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥ हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥ ४ ॥
अर्थ
जिन चरणों को जानकीजी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपट मृग के साथ पृथ्वी पर [उसे पकड़ने को] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजी के हृदय रूपी सरोवर में विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हीं को आज मैं देखूँगा।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
विभीषण की राम शरण