तब लगि कुसल न जीव कहुँ

दोहा ४६ · सुन्दरकाण्ड

दोहा पाठ

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ४६ ॥

अर्थ

तब तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को विश्राम है, जब तक वह शोक के घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्रीरामजी को नहीं भजता।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का दोहा ४६ है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण