जदपि सखा तव इच्छा नाहीं

चौपाई ५, दोहा ४९ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ ५ ॥

अर्थ

यद्यपि, हे सखा, तुम्हारी इच्छा नहीं है, तथापि जगत् में मेरा दर्शन अमोघ है। ऐसा कहकर श्रीरामजी ने उनको तिलक कर दिया। आकाश से पुष्पों की अपार वृष्टि हुई।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण