रावण को विभीषण की समझाइश और विभीषण का अपमान

विभीषण बार-बार रावण को धर्म और नीति का मार्ग अपनाने तथा सीताजी को लौटाने की सलाह देते हैं। रावण उनके हितकारी वचनों का अपमान करता है, जिससे विभीषण लंका छोड़ने का निश्चय करते हैं।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १५ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥ अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥ १ ॥

अर्थ:

रावण के लिए भी वही सहायता (संयोग) आ बनी है। मन्त्री उसे सुना-सुनाकर स्तुति करते हैं। [इसी समय] अवसर जानकर विभीषणजी आये। उन्होंने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया।

चौपाई

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥ जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥ २ ॥

अर्थ:

फिर वे सिर नवाकर अपने आसन पर बैठ गये और आज्ञा पाकर ये वचन बोले-हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात (राय) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ—।

चौपाई

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥ सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्री के ललाट को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथ के चन्द्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)।

चौपाई

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥ गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

चौदहों भुवनों का एक ही स्वामी हो, वह भी जीवों से वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणों का समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता।

दोहा

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ ३८ ॥

अर्थ:

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ— ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी को भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं।

दोहा 39 के अंतर्गत
चौपाई

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञान के भण्डार] भगवान्‌ हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं।

चौपाई

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ २ ॥

अर्थ:

उन कृपा के समुद्र भगवान् ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का हित करने के लिये ही मनुष्य-शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिये, वे सेवकों को आनन्द देनेवाले, दुष्टों के समूह का नाश करनेवाले और वेद तथा धर्म की रक्षा करनेवाले हैं।

चौपाई

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥ देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ ३ ॥

अर्थ:

वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागत का दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर) को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले श्रीरामजी को भजिये।

चौपाई

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ ४ ॥

अर्थ:

जिसे सम्पूर्ण जगत् से द्रोह करने का पाप लगा है, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूप में प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदय में यह समझ लीजिये।

दोहा

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ ३९ (क) ॥

अर्थ:

हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों में लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजी का भजन कीजिये।

दोहा

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभुसन कही पाइ सुअवसरु तात॥ ३९ (ख) ॥

अर्थ:

मुनि पुलस्त्यजी ने अपने शिष्य के हाथ यह बात कहला भेजी है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी।

दोहा 40 के अंतर्गत
चौपाई

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥ १ ॥

अर्थ:

माल्यवान् नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [और कहा--] हे तात! आपके छोटे भाई नीति को भूषणरूप में धारण करनेवाले अर्थात्‌ नीतिमान् हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदय में धारण कर लीजिये।

चौपाई

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥ माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥ २ ॥

अर्थ:

[रावण ने कहा--] ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान् तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे--।

चौपाई

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदय में रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की सम्पदाएँ (सुख की स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाम में विपत्ति (दुःख) रहती है।

चौपाई

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥ ४ ॥

अर्थ:

आपके हृदय में उलटी बुद्धि आ बसी है। इसी से आप हित को अहित और रिपु को मित्र मान रहे हैं। जो राक्षस कुल के लिये कालरात्रि [के समान] हैं, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है।

दोहा

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४० ॥

अर्थ:

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिये (मुझ बालक के आग्रह को स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिये)। श्रीरामजी को सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो।

दोहा 41 के अंतर्गत
चौपाई

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥ सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥ १ ॥

अर्थ:

विभीषण ने पण्डितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणी से नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गयी है!

चौपाई

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

ओरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात्‌ मेरे ही अन्न से पल रहा है), पर हे मूढ! पक्ष तुझे शत्रु का ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! बता न, जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं के बल से न जीता हो?

चौपाई

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥ अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरे नगर में रहकर प्रेम करता है तपस्वियों पर। मूर्ख! उन्हीं से जा मिल और उन्हीं को नीति बता। ऐसा कहकर रावण ने उन्हें लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषण ने (मारने पर भी) बार-बार उसके चरण ही पकड़े।

चौपाई

उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ ४ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी [बुराई करने वाले की] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजी ने कहा--] आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजी को भजने में ही है।

चौपाई

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥ ५ ॥

अर्थ:

[इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियों को साथ लेकर आकाशमार्ग में गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे--।

दोहा

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ ४१ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी सत्यसंकल्प एवं [सर्वसमर्थ] प्रभु हैं और [हे रावण!] तुम्हारी सभा काल के वश है। अतः मैं अब श्रीरघुवीर की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना।