रावण को विभीषण की समझाइश और विभीषण का अपमान
विभीषण बार-बार रावण को धर्म और नीति का मार्ग अपनाने तथा सीताजी को लौटाने की सलाह देते हैं। रावण उनके हितकारी वचनों का अपमान करता है, जिससे विभीषण लंका छोड़ने का निश्चय करते हैं।
सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १५ / २०
प्रकरण पाठ
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥ सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥ ३ ॥
अर्थ:
जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्री के ललाट को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे (अर्थात् जैसे लोग चौथ के चन्द्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)।
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥ ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥ १ ॥
अर्थ:
हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञान के भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥ जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥ २ ॥
अर्थ:
उन कृपा के समुद्र भगवान् ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का हित करने के लिये ही मनुष्य-शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिये, वे सेवकों को आनन्द देनेवाले, दुष्टों के समूह का नाश करनेवाले और वेद तथा धर्म की रक्षा करनेवाले हैं।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥ देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥ ३ ॥
अर्थ:
वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये। वे श्रीरघुनाथजी शरणागत का दुःख नाश करनेवाले हैं। हे नाथ! उन प्रभु (सर्वेश्वर) को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले श्रीरामजी को भजिये।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ ४ ॥
अर्थ:
जिसे सम्पूर्ण जगत् से द्रोह करने का पाप लगा है, शरण जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु (भगवान्) मनुष्यरूप में प्रकट हुए हैं। हे रावण! हृदय में यह समझ लीजिये।
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥ १ ॥
अर्थ:
माल्यवान् नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था। उसने उन (विभीषण) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [और कहा--] हे तात! आपके छोटे भाई नीति को भूषणरूप में धारण करनेवाले अर्थात् नीतिमान् हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदय में धारण कर लीजिये।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ ३ ॥
अर्थ:
हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदय में रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की सम्पदाएँ (सुख की स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाम में विपत्ति (दुःख) रहती है।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥ कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
ओरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात् मेरे ही अन्न से पल रहा है), पर हे मूढ! पक्ष तुझे शत्रु का ही अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! बता न, जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओं के बल से न जीता हो?
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥ अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥ ३ ॥
अर्थ:
मेरे नगर में रहकर प्रेम करता है तपस्वियों पर। मूर्ख! उन्हीं से जा मिल और उन्हीं को नीति बता। ऐसा कहकर रावण ने उन्हें लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषण ने (मारने पर भी) बार-बार उसके चरण ही पकड़े।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥ तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ ४ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी [बुराई करने वाले की] भलाई ही करते हैं। [विभीषणजी ने कहा--] आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजी को भजने में ही है।