सुनहु देव सचराचर स्वामी

चौपाई ३, दोहा ४९ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥ उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ ३ ॥

अर्थ

[विभीषणजी ने कहा--] हे देव! हे चराचर जगत् के स्वामी ! हे शरणागत के रक्षक! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले! सुनिये, मेरे हृदय में पहले कुछ वासना थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीतिरूपी नदी में बह गयी।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण