बहुरि राम छबिधाम बिलोकी
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी
चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥ भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥ २ ॥
अर्थ
फिर शोभा के धाम श्रीरामजी को देखकर वे पलक [मारना] रोककर ठिठककर (स्तब्ध होकर) एकटक देखते ही रह गये। भगवान् की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत के भय का नाश करनेवाला साँवला शरीर है।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।
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विभीषण की राम शरण