अब कृपाल निज भगति पावनी

चौपाई ४, दोहा ४९ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ ४ ॥

अर्थ

अब तो हे कृपालु ! शिवजी के मन को सदैव प्रिय लगने वाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये। एवमस्तु कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजी ने तुरंत ही समुद्र का जल माँगा।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण