निर्मल मन जन सो मोहि पावा

चौपाई ३, दोहा ४४ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥ ३ ॥

अर्थ

जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट, छल और छिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे कपीस! तुम्हें कुछ भी भय या हानि नहीं है।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
विभीषण की राम शरण