सब कै ममता ताग बटोरी

चौपाई ३, दोहा ४८ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥ ३ ॥

अर्थ

इन सबके ममत्वरूपी तागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धों का केन्द्र मुझे बना लेता है), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण