सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी

चौपाई २, दोहा ४९ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥ पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥ २ ॥

अर्थ

प्रभु की वाणी सुनते ही, उसे कानों के लिए अमृत जानकर विभीषणजी तृप्त नहीं होते। वे बार-बार श्रीरामजी के चरणकमलों को पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, वह हृदय में समाता नहीं है।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण