सिंघ कंध आयत उर सोहा

चौपाई ३, दोहा ४५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥ नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥ ३ ॥

अर्थ

सिंह के-से कंधे हैं, विशाल वक्षःस्थल (चौड़ी छाती) अत्यन्त शोभा दे रहा है। असंख्य कामदेवों के मन को मोहित करनेवाला मुख है। भगवान् के स्वरूप को देखकर विभीषणजी के नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया। फिर मन में धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण