बरु भल बास नरक कर ताता

चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥ अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥ ४ ॥

अर्थ

हे तात! नरक में रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्ट का संग [कभी] न दे। [विभीषणजी ने कहा—] हे रघुनाथजी! अब आपके चरणों का दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “विभीषण की राम शरण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण के लंका त्यागकर श्रीराम की शरण में आने और प्रभु द्वारा कृपापूर्वक स्वीकार किए जाने का वर्णन है।

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विभीषण की राम शरण