समुद्र पार करने के लिए विचार, रावणदूत शुक का आना और लक्ष्मणजी के पत्र को लेकर लौटना

समुद्र पार करने के उपाय पर विचार होता है। इसी बीच रावण का दूत शुक आता है और अंततः लक्ष्मणजी का पत्र लेकर रावण के पास लौटता है।

सुन्दरकाण्ड · प्रकरण १७ / २०

प्रकरण पाठ

चौपाई

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥ निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसे परम कृपालु प्रभु को छोड़कर जो मनुष्य दूसरे को भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछ के पशु हैं। अपना सेवक जानकर विभीषण को श्रीरामजी ने अपना लिया। प्रभु का स्वभाव वानरकुल के मन को [बहुत] भाया।

चौपाई

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥ बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥ २ ॥

अर्थ:

फिर सब कुछ जानने वाले, सब के हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित, उदासीन, कारणवश मनुष्य बने हुए तथा राक्षसों के कुल का नाश करने वाले श्रीरामजी ने नीति की रक्षा करने वाले वचन बोले—

चौपाई

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥ संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥ ३ ॥

अर्थ:

हे कपीस, हे लंकापति वीर! सुनो, इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए ? अनेक जातियों के मगर, साँप और मछलियों से भरा हुआ यह अत्यन्त अथाह समुद्र पार करने में सब प्रकार से कठिन है।

चौपाई

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥ ४ ॥

अर्थ:

विभीषणजी ने कहा—हे रघुनाथजी ! सुनिये, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला है, तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि पहले जाकर समुद्र से प्रार्थना की जाय।

दोहा

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥ ५० ॥

अर्थ:

हे प्रभु! समुद्र आपके कुलगुरु हैं, वे विचारकर उपाय बतला देंगे। तब रीछ और वानरों की सारी सेना बिना ही परिश्रम के समुद्र के पार उतर जायगी।

दोहा 51 के अंतर्गत
चौपाई

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥ मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥ १ ॥

अर्थ:

[ श्रीरामजी ने कहा--] हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया। यही किया जाय, यदि दैव सहायक हों। यह सलाह लक्ष्मणजी के मन को अच्छी नहीं लगी। श्रीरामजी के वचन सुनकर तो उन्होंने बहुत ही दुःख पाया।

चौपाई

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥ कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥ २ ॥

अर्थ:

[लक्ष्मणजी ने कहा--] हे नाथ! दैव का कौन भरोसा! मन में क्रोध कीजिए (ले आइए) और समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं।

चौपाई

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥ अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥ ३ ॥

अर्थ:

यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले--ऐसे ही करेंगे, मन में धीरज रखो। ऐसा कहकर छोटे भाई को समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी समुद्र के समीप गए।

चौपाई

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥ जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया। फिर किनारे पर कुश बिछाकर बैठ गए। इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभु के पास आये थे, त्यों ही रावण ने उनके पीछे दूत भेजे थे।

दोहा

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥ ५१ ॥

अर्थ:

कपट से वानर का शरीर धारण कर उन्होंने सब लीलाएँ देखीं। वे अपने हृदय में प्रभु के गुणों और शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे।

दोहा 52 के अंतर्गत
चौपाई

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥ १ ॥

अर्थ:

फिर वे प्रकट रूप में भी अत्यन्त प्रेम के साथ श्रीरामजी के स्वभाव की बड़ाई करने लगे, उन्हें दुराव (कपट वेष) भूल गया! तब वानरों ने जाना कि ये शत्रु के दूत हैं और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आये।

चौपाई

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥ सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥ २ ॥

अर्थ:

सुग्रीव ने कहा--सब वानरों! सुनो, राक्षसों के अंग-भंग करके भेज दो। सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े। दूतों को बाँधकर उन्होंने सेना के चारों ओर घुमाया।

चौपाई

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥ जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥ ३ ॥

अर्थ:

वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। [तब दूतों ने पुकारकर कहा--] जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामजी की सौगंध है।

चौपाई

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥ रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥ ४ ॥

अर्थ:

यह सुनकर लक्ष्मणजी ने सब को निकट बुलाया। उन्हें बड़ी दया लगी, इससे हँसकर उन्होंने राक्षसों को तुरंत ही छुड़ा दिया। [और उनसे कहा--] रावण के हाथ में यह चिट्ठी देना [और कहना--] हे कुलघाती! लक्ष्मण के वचन बाँचो।

दोहा

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥ ५२ ॥

अर्थ:

फिर उस मूर्ख से मुँहजुबानी यह मेरा उदार (कृपा से भरा हुआ) संदेश कहना कि सीता को दे कर मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया [समझो]।

दोहा 53 के अंतर्गत
चौपाई

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥ कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥ १ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी के चरणों में मस्तक नवाकर, श्रीरामजी के गुणों की कथा वर्णन करते हुए दूत तुरंत ही चल दिये। श्रीरामजी का यश कहते हुए वे लंका में आये और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाये।

चौपाई

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥ पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥ २ ॥

अर्थ:

दशमुख रावण ने हँसकर बात पूछी--अरे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषण का समाचार सुना, जिसकी मृत्यु अत्यन्त निकट आ गयी है।

चौपाई

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥ पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥ ३ ॥

अर्थ:

मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका को त्याग दिया। अभागा अब जौ के कीड़े जैसा हो जाएगा। फिर भालू और वानरों की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आयी है।

चौपाई

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥ कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

और जिनके जीवन का रक्षक कोमल चित्तवाला बेचारा समुद्र बन गया है (अर्थात् उनके और राक्षसों के बीच में यदि समुद्र न होता तो अब तक राक्षस उन्हें मारकर खा गये होते)। फिर उन तपस्वियों की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा डर है।

दोहा

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ ५३ ॥

अर्थ:

उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानों से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गये? शत्रु-सेना का तेज और बल बताता क्यों नहीं? तेरा चित्त बहुत ही चकित (भौंचक्का-सा) हो रहा है।