शूर्पणखा की कथा, शूर्पणखा का खर-दूषण के पास जाना और खर-दूषण आदि का वध

शूर्पणखा की कामासक्ति और दुष्टता से वन में संघर्ष छिड़ जाता है। अपमानित होकर वह खर-दूषण को उकसाती है, और अंत में श्रीराम उनकी सेना सहित उनका संहार करते हैं।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण ९ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥ खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥ १ ॥

अर्थ:

बिना नाक-कान के वह विकराल हो गयी। [उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा] मानो [काले] पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गयी। [और बोली--] हे भाई! तुम्हारे पौरुष (वीरता) को धिक्कार है, तुम्हारे बल को धिक्कार है।

चौपाई

तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥ धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने पूछा, तब शूर्पणखा ने सब समझाकर कहा। सब सुनकर राक्षसों ने सेना तैयार की। राक्षस-समूह झुंड-के-झुंड दौड़े। मानो पंखधारी काजल के पर्वतों का झुंड हो।

चौपाई

नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥ सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥ ३ ॥

अर्थ:

वे अनेकों प्रकार की सवारियों पर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार के हैं। वे अपार हैं और अनेकों प्रकार के असंख्य भयानक हथियार धारण किए हुए हैं। उन्होंने नाक-कान हीन, अशुभ रूपवाली शूर्पणखा को आगे कर लिया।

चौपाई

असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥ गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

अनगिनत भयानक अशकुन हो रहे हैं। परन्तु मृत्यु के वश होने के कारण वे सब-के-सब उनको कुछ गिनते ही नहीं। गरजते हैं, तर्जते हैं और आकाश में उड़ते हैं। सेना देखकर योद्धा बहुत ही हर्षित होते हैं।

चौपाई

कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥ धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥ ५ ॥

अर्थ:

कोई कहता है दोनों भाइयों को जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्री को छीन लो। आकाशमण्डल धूल से भर गया। तब श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी को बुलाकर उनसे कहा--।

चौपाई

लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥ रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥ ६ ॥

अर्थ:

राक्षसों की भयानक सेना आ गयी है। जानकीजी को लेकर तुम पर्वत की कन्दरा में चले जाओ। सावधान रहना। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के वचन सुनकर लक्ष्मणजी हाथ में धनुष-बाण लिए श्रीसीताजी सहित चले।

चौपाई

देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥ ७ ॥

अर्थ:

शत्रुओं की सेना [समीप] चली आयी है, यह देखकर श्रीरामजी ने हँसकर कठिन धनुष को चढ़ाया।

छन्द

कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥ कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै॥ चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥

अर्थ:

कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटाओं का जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकत-मणि के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो साँप लड़ रहे हों। कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों की ओर देख रहे हैं। मानो मृगराज सिंह हाथियों के समूह को देखकर [उनकी ओर] निहार रहा हो॥

सोरठा

आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥ १८ ॥

अर्थ:

‘पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर धावते हुए आये। जैसे बाल-सूर्य को अकेला देखकर दनुज घेर लेते हैं।

दोहा 19 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥ सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥ १ ॥

अर्थ:

[सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] प्रभु श्रीरामजी को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह गयी। वे उन पर बाण नहीं छोड़ सके। मन्त्री को बुलाकर खर-दूषण ने कहा--यह राजकुमार कोई मनुष्यों का भूषण है।

चौपाई

नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥ हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥ २ ॥

अर्थ:

जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमें से हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं। पर हे सब भाइयो! सुनो, हमने जन्म भर में ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी।

चौपाई

जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥ देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि इन्होंने हमारी बहिन को कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं। 'छिपायी हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते-जी घर लौट जाओ'।

चौपाई

मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु॥ दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई॥ ४ ॥

अर्थ:

मेरा यह कथन तुम लोग उसे सुनाओ और उसका वचन (उत्तर) सुनकर शीघ्र आओ। दूतों ने जाकर यह सन्देश श्रीरामचन्द्रजी से कहा। उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुसकराकर बोले--।

चौपाई

हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

हम क्षत्रिय हैं, वन में शिकार करते हैं और तुम्हारे-से दुष्ट मृगों को ढूँढ़ते ही फिरते हैं। हम बलवान शत्रु को देखकर नहीं डरते। [लड़ने को आवे तो] एक बार काल से भी लड़ सकते हैं।

चौपाई

जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥ जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥ ६ ॥

अर्थ:

यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्यकुल का घालने वाले, मुनियों के पालक, दुष्टों के संहारक बालक हैं। यदि बल न हो तो घर लौट जाओ। संग्राम में विमुख मैं किसी को नहीं मारता।

चौपाई

रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥ दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ॥ ७ ॥

अर्थ:

रण में चढ़कर कपट-चतुराई करना और शत्रु पर कृपा करना (दया दिखाना) तो बड़ी भारी कायरता है। दूतों ने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं, जिन्हें सुनकर खर-दूषण का हृदय अत्यन्त जल उठा।

छन्द

उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा॥ प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा। भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥

अर्थ:

[खर-दूषण] का हृदय जल उठा। तब उन्होंने कहा--पकड़ लो। [यह सुनकर] भयानक राक्षस योद्धा बाण, धनुष, तोमर, शक्ति, शूल, कृपाण, परिघ और परशु धारण किए हुए दौड़ पड़े। प्रभु श्रीरामजी ने पहले धनुष की कठोर, घोर और भयावह टंकार की, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गए। उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा॥

दोहा

सावधान होइ धाए जानि सबल आराति। लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति॥ १९ (क) ॥

अर्थ:

फिर वे शत्रु को बलवान् जानकर सावधान होकर दौड़े और श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर बहुत प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे।

दोहा

तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर। तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर॥ १९ (ख) ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीरजी ने उनके हथियारों को तिल के समान कर काट डाला। फिर धनुष को कान तक तानकर अपने तीर छोड़े॥

दोहा 20 के अंतर्गत
छन्द

तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥ कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥ १ ॥

अर्थ:

तब भयानक बाण ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत-से सर्प जा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी संग्राम में क्रुद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले।

छन्द

अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥ भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥ २ ॥

अर्थ:

अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों को देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले। तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रुद्ध होकर बोले—जो रण से भागकर जाएगा,

छन्द

तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥ आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥ ३ ॥

अर्थ:

उसका हम अपने हाथों से वध करेंगे। तब मन में मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और सामने होकर वे अनेक प्रकार के हथियारों से श्रीरामजी पर प्रहार करने लगे।

छन्द

रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥ छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥ ४ ॥

अर्थ:

शत्रु को अत्यन्त कुपित जानकर प्रभु ने धनुष पर बाण चढ़ाकर बहुत-से बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे।

छन्द

उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥ चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान॥ ५ ॥

अर्थ:

उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वी पर गिरने लगे। बाण लगते ही वे चिल्लाते हैं। धड़ पहाड़ के समान गिर रहे हैं।

छन्द

भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड॥ नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥ ६ ॥

अर्थ:

योद्धाओं के शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। आकाश में बहुत-सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिर के धड़ दौड़ रहे हैं।

छन्द

खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल॥ ७ ॥

अर्थ:

चील [या क्रौंच], कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयावह कट-कट शब्द कर रहे हैं।

छन्द

कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥ रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा॥ १ ॥

अर्थ:

सियार कटकटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं [अथवा खप्पर भर रहे हैं]। वीर-वैताल खोपड़ियों पर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं। श्रीरघुवीर के प्रचण्ड बाण योद्धाओं के वक्षःस्थल, भुजा और सिरों के टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। वे जहाँ-तहाँ गिर पड़ते हैं, फिर उठते और लड़ते हैं और 'पकड़ो-पकड़ो' का भयकर शब्द करते हैं।

छन्द

अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥ मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥ २ ॥

अर्थ:

अँतड़ियों के एक छोर को पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हीं का दूसरा छोर हाथ से पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगर के निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये। बहुत-से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेना को व्याकुल देखकर तिसिरादि खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजी की ओर मुड़े।

छन्द

सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥ प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका॥ ३ ॥

अर्थ:

अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बार में श्रीरघुवीर पर छोड़ने लगे। प्रभु ने पल भर में शत्रुओं के बाणों को काटकर, ललकारकर उन पर अपने बाण छोड़े। सब राक्षस-सेनापतियों के हृदय में दस-दस बाण मारे।

छन्द

महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥ सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्‌यो। देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मर्‌यो॥ ४ ॥

अर्थ:

योद्धा पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं। मरते नहीं, बहुत प्रकार की अतिशय माया रचते हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत [राक्षस] चौदह हजार हैं और एक अवधधनी श्रीरामजी अकेले हैं। देवता और मुनियों को भयभीत देखकर मायानाथ प्रभु ने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को रामरूप देखने लगी और आपस में ही युद्ध करके लड़ मरी।

दोहा

राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥ २० (क) ॥

अर्थ:

सब 'यही राम है, इसे मारो' इस प्रकार राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्रीरामजी ने यह उपाय करके क्षण भर में शत्रुओं को मार डाला।

दोहा

हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुतिकरि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥ २० (ख) ॥

अर्थ:

देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाश में नगाड़े बज रहे हैं। फिर वे सब स्तुति करके अनेकों विमानों पर सुशोभित होकर चले गये।

दोहा 21 के अंतर्गत
चौपाई

जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते॥ तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥ १ ॥

अर्थ:

जब श्रीरघुनाथजी ने युद्ध में शत्रुओं को जीत लिया तथा देवता, मनुष्य और मुनि सब के भय नष्ट हो गये, तब लक्ष्मणजी सीताजी को ले आये। चरणों में पड़ते हुए उनको प्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदय से लगा लिया।

चौपाई

सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥ पंचबटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥ २ ॥

अर्थ:

सीताजी श्रीरामजी के श्याम और कोमल शरीर को परम प्रेम के साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं। इस प्रकार पंचवटी में बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियों को सुख देने वाले चरित्र करने लगे।