हम छत्री मृगया बन करहीं

चौपाई ५, दोहा १९ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥ ५ ॥

अर्थ

हम क्षत्रिय हैं, वन में शिकार करते हैं और तुम्हारे-से दुष्ट मृगों को ढूँढ़ते ही फिरते हैं। हम बलवान शत्रु को देखकर नहीं डरते। [लड़ने को आवे तो] एक बार काल से भी लड़ सकते हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।

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शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध