नाक कान बिनु भइ बिकरारा
नाक कान बिनु भइ बिकरारा
चौपाई १, दोहा १८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥ खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥ १ ॥
अर्थ
बिना नाक-कान के वह विकराल हो गयी। [उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा] मानो [काले] पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गयी। [और बोली--] हे भाई! तुम्हारे पौरुष (वीरता) को धिक्कार है, तुम्हारे बल को धिक्कार है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।
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शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध