सीता चितव स्याम मृदु गाता

चौपाई २, दोहा २१ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥ पंचबटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥ २ ॥

अर्थ

सीताजी श्रीरामजी के श्याम और कोमल शरीर को परम प्रेम के साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं। इस प्रकार पंचवटी में बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियों को सुख देने वाले चरित्र करने लगे।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।

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शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध