अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर
छन्द २, दोहा २० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥ मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥ २ ॥
अर्थ
अँतड़ियों के एक छोर को पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हीं का दूसरा छोर हाथ से पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगर के निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये। बहुत-से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेना को व्याकुल देखकर तिसिरादि खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजी की ओर मुड़े।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का छन्द २, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।