महि परत उठि भट भिरत मरत
छन्द ४, दोहा २० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥ सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्यो। देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मर्यो॥ ४ ॥
अर्थ
योद्धा पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं। मरते नहीं, बहुत प्रकार की अतिशय माया रचते हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत [राक्षस] चौदह हजार हैं और एक अवधधनी श्रीरामजी अकेले हैं। देवता और मुनियों को भयभीत देखकर मायानाथ प्रभु ने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को रामरूप देखने लगी और आपस में ही युद्ध करके लड़ मरी।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का छन्द ४, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।