कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट
छन्द, दोहा १८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥ कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै॥ चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥
अर्थ
कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटाओं का जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकत-मणि के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो साँप लड़ रहे हों। कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों की ओर देख रहे हैं। मानो मृगराज सिंह हाथियों के समूह को देखकर [उनकी ओर] निहार रहा हो॥
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का छन्द, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।
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शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध