शूर्पणखा का रावण के निकट जाना, श्रीसीताजी का अग्नि प्रवेश और माया सीता

शूर्पणखा रावण के पास जाकर सीताजी के रूप का वर्णन करती है और उसके भीतर दुराशा जगाती है। इसी क्रम में श्रीसीताजी के अग्नि प्रवेश और माया सीता के प्रकट होने का रहस्यपूर्ण प्रसंग आता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १० / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥ बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥ ३ ॥

अर्थ:

खर-दूषण का विध्वंस देखकर शूर्पणखा ने जाकर रावण को भड़काया। वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली—तूने देश और खजाने की सुधि ही भुला दी।

चौपाई

करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥ बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥ संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥ ४-५ ॥

अर्थ:

शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिर पर खड़ा है ? राजनीति के बिना राज्य, धन के बिना धर्म, हरि को समर्पण किए बिना सत्कर्म, विद्या के बिना विवेक उत्पन्न किये जाने से और पढ़ने, किए जाने तथा पाने से श्रम का ही फल मिलता है। संग से जती, कुमंत्र से राजा, मान से ज्ञान, पान से लज्जा।

चौपाई

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी॥ ६ ॥

अर्थ:

नम्रता के बिना प्रीति और मद से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, ऐसा मैंने सुना है।

सोरठा

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥ २१ (क) ॥

अर्थ:

शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, प्रभु और सर्प को छोटा करके नहीं समझना चाहिये। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।

दोहा

सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ। तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ॥ २१ (ख) ॥

अर्थ:

सभा के बीच वह व्याकुल होकर पड़ी हुई बहुत प्रकार से रो-रोकर कह रही है कि अरे दशकंधर! तेरे जीते-जी मेरी क्या ऐसी गति होनी चाहिये ?

दोहा 22 के अंतर्गत
चौपाई

सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाँह उठाई॥ कह लंकेस कहसि निज बाता। केइँ तव नासा कान निपाता॥ १ ॥

अर्थ:

शूर्पणखाके वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे। उन्होंने शूर्पणखाकी बाँह पकड़कर उसे उठाया और समझाया। लंकेश ने कहा--अपनी बात तो बता, किसने तेरी नाक-कान काट लिये?

चौपाई

अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए॥ समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी॥ २ ॥

अर्थ:

[वह बोली--] अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं, वन में खेलने आये हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे।

चौपाई

जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन॥ देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनकी भुजाओं का बल पाकर हे दशानन! मुनि लोग वन में निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखने में तो बालक हैं, पर काल के समान हैं। वे परम धीर, धनुर्धर और अनेक गुणों से युक्त हैं।

चौपाई

अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥ सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥ ४ ॥

अर्थ:

दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टों के वध करने में लगे हैं और देवता तथा मुनियों को सुख देने वाले हैं। वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक श्यामा स्त्री है।

चौपाई

रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥ तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥ ५ ॥

अर्थ:

विधाता ने उस स्त्री को रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रतियाँ उस पर बलिहारी हैं। उसके छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले। सुनकर तुम्हारी बहिन कहकर वे मेरा परिहास करने लगे।

चौपाई

खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा॥ खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता॥ ६ ॥

अर्थ:

मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आये। पर उन्होंने क्षणभर में सारी सेना को मार डाला। खर-दूषण और त्रिशिरा के वध का समाचार सुनकर रावण के सारे अंग जल उठे।

दोहा

सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति। गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥ २२ ॥

अर्थ:

उसने शूर्पणखाको समझाकर अपने बलका बहुत प्रकार से बखान किया; [पर मनमें] वह अत्यन्त चिन्तावश होकर अपने भवन गया। रात में नींद नहीं पड़ती थी।

दोहा 23 के अंतर्गत
चौपाई

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥ खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥ १ ॥

अर्थ:

[वह मन-ही-मन विचार करने लगा--] देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवक का मुकाबला कर सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें भगवान् के सिवा और कौन मार सकता था?

चौपाई

सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥ तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥ २ ॥

अर्थ:

देवताओं को आनन्द देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान् ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक बैर करूँगा और प्रभु के बाण [के आघात] से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊँगा।

चौपाई

होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥ जौं नररूप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, कर्म और वचन से यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनों को रण में जीतकर उनकी स्त्री को हर लूँगा।

चौपाई

चला अकेल जान चढ़ि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ॥ इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई॥ ४ ॥

अर्थ:

[यों विचारकर] रावण रथ पर चढ़कर अकेला ही वहाँ चला, जहाँ समुद्र के तट पर मारीच रहता था। [शिवजी कहते हैं कि--] हे पार्वती! यहाँ श्रीरामचन्द्रजी ने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो।

दोहा

लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद। जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥ २३ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी जब कन्द-मूल-फल लेने के लिये वन में गये, तब [अकेले में] कृपा और सुख के समूह श्रीरामचन्द्रजी हँसकर जानकीजी से बोले--।

दोहा 24 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥ १ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! हे सुन्दर व्रतवाली, सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा। इसलिये जबतक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तबतक तुम अग्नि में निवास करो।

चौपाई

जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥ निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं। सीताजी ने अपनी छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी।