शूर्पणखा का रावण के निकट जाना, श्रीसीताजी का अग्नि प्रवेश और माया सीता
शूर्पणखा रावण के पास जाकर सीताजी के रूप का वर्णन करती है और उसके भीतर दुराशा जगाती है। इसी क्रम में श्रीसीताजी के अग्नि प्रवेश और माया सीता के प्रकट होने का रहस्यपूर्ण प्रसंग आता है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण १० / १८
प्रकरण पाठ
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥ बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥ संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥ ४-५ ॥
अर्थ:
शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिर पर खड़ा है ? राजनीति के बिना राज्य, धन के बिना धर्म, हरि को समर्पण किए बिना सत्कर्म, विद्या के बिना विवेक उत्पन्न किये जाने से और पढ़ने, किए जाने तथा पाने से श्रम का ही फल मिलता है। संग से जती, कुमंत्र से राजा, मान से ज्ञान, पान से लज्जा।
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥ सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥ ४ ॥
अर्थ:
दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टों के वध करने में लगे हैं और देवता तथा मुनियों को सुख देने वाले हैं। वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक श्यामा स्त्री है।
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥ खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥ १ ॥
अर्थ:
[वह मन-ही-मन विचार करने लगा--] देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवक का मुकाबला कर सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें भगवान् के सिवा और कौन मार सकता था?
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥ तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥ २ ॥
अर्थ:
देवताओं को आनन्द देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान् ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक बैर करूँगा और प्रभु के बाण [के आघात] से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊँगा।
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥ निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं। सीताजी ने अपनी छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी।