असगुन अमित होहिं भयकारी

चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥ गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥ ४ ॥

अर्थ

अनगिनत भयानक अशकुन हो रहे हैं। परन्तु मृत्यु के वश होने के कारण वे सब-के-सब उनको कुछ गिनते ही नहीं। गरजते हैं, तर्जते हैं और आकाश में उड़ते हैं। सेना देखकर योद्धा बहुत ही हर्षित होते हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा की दुष्टता, उसके उकसावे पर खर-दूषण का श्रीराम से युद्ध और उनका संहार का वर्णन है।

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शूर्पणखा कथा, खर-दूषण वध