जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं
चौपाई ५, दोहा ८८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं॥ ५ ॥
अर्थ
गीदड़ों के समूह कट-कट शब्द करते हुए मुरदों को काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जाने पर एक दूसरे को डाँटते हैं। करोड़ों धड़ बिना सिर के घूम रहे हैं और सिर पृथ्वी पर पड़े जय-जय बोल रहे हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध