सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन
दोहा ८६ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार। जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥ ८६ ॥
अर्थ
शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलों की अपार वर्षा करने लगे। और शोभा, शक्ति और गुणों के धाम करुणानिधान प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो [ऐसा पुकारने लगे]।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का दोहा ८६ है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध