कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका
चौपाई ३, दोहा ८५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका॥ जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा॥ ३ ॥
अर्थ
वानर खेल से ही कूदकर लंका पर जा चढ़े और निर्भय रावण के महल में जा घुसे। ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरों को बहुत क्रोध हुआ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध