कपि लंगूर बिपुल नभ छाए
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए
चौपाई ३, दोहा ८७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए॥ उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा॥ ३ ॥
अर्थ
वानरों की बहुत-सी पूँछें आकाश में छायी हुई हैं। वे ऐसी शोभा दे रही हैं मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उदय हुए हों। धूल ऐसी उठ रही है मानो जल की धारा हो। बाणरूपी बूँदों की अपार वृष्टि हुई।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध