आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति

छन्द, दोहा ८४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो। गिर्‌यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो॥ सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो। रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो॥

अर्थ

फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रता से रावण के रथ को चूर-चूर कर और सारथी को मारकर उसे व्याकुल कर दिया। सौ बाणों से उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथी उसे रथ में डालकर तुरंत ही लंका ले गया। प्रताप के समूह श्रीरघुवीर के भाई लक्ष्मणजी ने फिर आकर प्रभु के चरणों में प्रणाम किया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।

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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध