अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो
चौपाई ३, दोहा ८४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥ कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥ ३ ॥
अर्थ
ऐसा कहकर और लक्ष्मणजी को उठाकर हनुमानजी श्रीरघुनाथजी के पास ले आये। यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीर ने [लक्ष्मणजी से] कहा--हे भाई! हृदय में समझो, तुम काल के भी भक्षक और देवताओं के रक्षक हो।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध