एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई
चौपाई २, दोहा ८८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई॥ कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे॥ २ ॥
अर्थ
एक (कोई) कहते हैं, अरे मूर्खो! ऐसी सौंघाई (बहुतायत) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तट पर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल (आधे जल में पड़े) पड़े हों।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध