बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड
छन्द, दोहा ८८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं। खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥ बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए। संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए॥
अर्थ
मुण्ड (कटे सिर) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड (धड़) बिना सिर के दौड़ते हैं। खप्परों और तलवारों में उलझ-उलझकर योद्धा आपस में लड़ते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओं को ढहा रहे हैं। वानर राक्षसों के झुण्डों को मसल रहे हैं, श्रीराम के बल से दर्पित होकर। संग्राम-आँगन में योद्धा सो रहे हैं, श्रीराम के बाण-समूहों से हए हुए॥
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध