दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा

चौपाई ४, दोहा ८७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा॥ रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई॥ ४ ॥

अर्थ

दोनों ओर से योद्धा पर्वतों का प्रहार करते हैं। मानो बार-बार वज्रपात हो रहा हो। श्रीरघुनाथजी ने क्रोध करके बाणों की झड़ी लगा दी, जिससे राक्षसों की सेना घायल हो गयी।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।

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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध