चलत होहिं अति असुभ भयंकर
चलत होहिं अति असुभ भयंकर
चौपाई १, दोहा ८६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर॥ भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना॥ १ ॥
अर्थ
चलते समय अत्यन्त अशुभ और भयंकर अपशकुन होने लगे। गीध उड़-उड़कर उसके सिरों पर बैठने लगे। किन्तु वह काल के वश था, इससे किसी भी अपशकुन को नहीं मानता था। उसने कहा-- युद्ध का डंका बजाओ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध