सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि
छन्द, दोहा ८६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो। भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो॥ कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे। ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे॥
अर्थ
प्रभु ने हाथ में सारंग धनुष लेकर कमर में बाणों की खान-सा सुन्दर तरकस कस लिया। उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं, मनोहर और लम्बी भुजाएँ हैं, तथा छाती पर धरासुर-पद शोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथ में लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओं के हाथी, कच्छप, सर्प, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध