नहिं चितव जब करि कोप कपि
नहिं चितव जब करि कोप कपि
छन्द, दोहा ८५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं। धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं॥ तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई। एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई॥
अर्थ
जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दाँतों से पकड़कर [काटने और] लातों से मारने लगे। स्त्रियों को बाल पकड़कर घर से बाहर घसीट लाये, वे अत्यन्त ही दीन होकर पुकारने लगीं। तब रावण काल के समान क्रोधित होकर उठा और वानरों को पैर पकड़कर पटकने लगा। इसी बीच वानरों ने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मन में हारने लगा (निराश होने लगा)।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध