खैंचहिं गीध आँत तट भए
खैंचहिं गीध आँत तट भए
चौपाई ३, दोहा ८८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए॥ बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं॥ ३ ॥
अर्थ
गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तट पर चित्त लगाए हुए बंसी खेल रहे हों। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उन पर चढ़े चले जा रहे हैं। मानो वे नदी में नावरि (नौकाक्रौड़ा) खेल रहे हों।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।
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रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध