जानु टेकि कपि भूमि न गिरा

चौपाई १, दोहा ८४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा॥ मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा॥ १ ॥

अर्थ

हनुमानजी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वी पर गिरे नहीं। फिर क्रोध से भरे हुए सँभालकर उठे। हनुमानजी ने रावण को एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मूर्च्छा, उसके यज्ञ के विध्वंस और राम-रावण के प्रचंड युद्ध का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
रावण की मूर्च्छा, राम-रावण युद्ध