रावन सिर सरोज बनचारी
रावन सिर सरोज बनचारी
चौपाई ४, दोहा ९२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
रावन सिर सरोज बनचारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥ दस दस बान भाल दस मारे। निसरि गए चले रुधिर पनारे॥ ४ ॥
अर्थ
रावण के सिररूपी कमलवन में विचरण करनेवाले श्रीरघुवीर के बाणरूपी भ्रमरों की पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजी ने उसके दसों सिरों में दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरों से रक्त के पनाले बह चले।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।
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इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध