जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर
दोहा ९२ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार। सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥ ९२ ॥
अर्थ
जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरों को काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयों का सेवन करने से काम (उन्हें भोगने की इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का दोहा ९२ है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध