जीतेहु जे भट संजुग माहीं
जीतेहु जे भट संजुग माहीं
चौपाई २, दोहा ९० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥ रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥ २ ॥
अर्थ
[उसने कहा-- ] ओरे तपस्वी ! सुनो, तुमने युद्ध में जिन योद्धाओं को जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोकपाल जिसके बंदीखाने में पड़े हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।
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इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध