भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन
छन्द, दोहा ९१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे। कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे॥ मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे। चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे॥
अर्थ
युद्ध में शत्रु के विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकस में बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलने को आतुर होने लगे)। उनके धनुष का अत्यन्त प्रचण्ड शब्द (टछ्लार) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये (अत्यन्त भयभीत हो गये)। मन्दोदरी का हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये। दिशाओं के हाथी पृथ्वी को दाँतों से पकड़कर चिग्घाड़ने लगे। यह कौतुक देखकर देवता हँसे॥।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।