अस कहि रथ रघुनाथ चलावा

चौपाई १, दोहा ९० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा॥ १ ॥

अर्थ

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने ब्राह्मणों के चरणकमलों में सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब लंकेश के हृदय में क्रोध छा गया और वह गरजता तथा तर्जना करता हुआ सामने दौड़ा।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।

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इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध