काटे सिर नभ मारग धावहिं
काटे सिर नभ मारग धावहिं
चौपाई ४, दोहा ९३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥ कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥ ४ ॥
अर्थ
काटे हुए सिर आकाशमार्ग से दौड़ते हैं और जय-जय की ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं?
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।
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इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध