पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा

चौपाई ७, दोहा ९२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा॥ रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू। मानहुँ अमित केतु अरु राहू॥ ७ ॥

अर्थ

प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरों को काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं। आकाश में सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।

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इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध