कहँ रामु कहि सिर निकर धाए
कहँ रामु कहि सिर निकर धाए
छन्द, दोहा ९३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले। संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥ सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं। करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥
अर्थ
राम कहाँ हैं? यह कहकर सिरों के निकर दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले। तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजी ने हँसकर बाणों से उन सिरों को भलीभाँति बेध डाला। हाथों में मुण्डों की मालाएँ लेकर बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-झुंड मिलकर इकट्ठी हुईं और वे रुधिर की नदी में स्नान करके चलीं, मानो संग्रामरूपी वट-पूजन करने जा रही हों॥
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ९३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इंद्र के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर श्रीराम और रावण का घोर युद्ध का वर्णन है।
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इंद्र का दिव्य रथ, राम-रावण युद्ध