कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए
चौपाई २, दोहा ८५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥ किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥ २ ॥
अर्थ
प्रेमयुक्त, कोमल और सुन्दर वचन कहकर श्रीरामजी ने बहुत प्रकार से लोगों को समझाया और बहुतेरे धर्म-सम्बन्धी उपदेश दिये; परन्तु प्रेमवश लोग लौटते नहीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।
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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना