लोग बिकल मुरुछित नरनाहू
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू
चौपाई ४, दोहा ७९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥ रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥ ४ ॥
अर्थ
लोग व्याकुल हैं, राजा मूर्छित हो गये हैं। किसी को कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्रीरामचन्द्रजी तुरंत मुनि का वेष बनाकर माता-पिता को सिर नवाकर चल दिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।
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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना